Saturday, March 25, 2017

कदम दरवाजे से बाहर रखने ही वाला था कि पीछे से किसी ने आवाज़ दी,

"रुको."

वरुण ने पलट के देखा तो कोई नहीं था, होता भी कैसे! खाली मकान था और खाली मकानों से कहीं आवाज़ें आती हैं भला! वहम होगा सोच कर उसने दरवाजे पर ताला लगाया और गली पार कर सड़क पर आया ही था कि मोटर सायकल से टकराते हुए बचा, कुछ देर पहले की बात और माँ की कही हुई बात याद आ गयी कि जाते हुए को पीछे से आवाज़ देना अशुभ होता है, लेकिन वहाँ तो कोई नहीं था फिर आवाज़ कैसे आयेगी, या सच में ही किसी ने पुकारा था! पता नहीं क्या था ख़ैर जो भी हो उसे बैंक जल्दी पहुँचना था, हाल ही में हुए तबादलों की वजह से उसका काम बढ़ गया था।

बैंक में भी दिनभर काम में उलझा रहा, कभी अच्छे से बोलता तो कभी किसी छोटी सी बात पर खीज उठता, जब तक काम में व्यस्त रहता तब तक तो ठीक लेकिन जैसे ही फुर्सत मिलती फिर सुबह वाली घटना याद आ जाती।

ख़ैर दिन बीता और काम से लौट कर घर आया, जैसे ही दरवाज़ा खोला सामने वाली दीवार पर लगी माँ बाबूजी के साथ वाली तस्वीर दिखी जो थोड़ी तिरछी हो गयी थी, धीमे क़दमों से तस्वीर के पास पहुँचा, गौर से देखा, उसी पल सुबह की घटना और वो आवाज़ पहचान में आ गयी, घबरा गया अन्जानी आशंका से, फ़ौरन तस्वीर सीधी की और गाँव में माँ बाबूजी को फ़ोन लगाया 6-7 बार बजने के बाद उसके बाबूजी की आवाज़ दूसरी तरफ गूँजी,

"हेल्लो, कौन?"

"बाबूजी, प्रणाम, मैं वरुण..."

इतना ही कह पाया कि उसने बाबूजी को ज़ोर से आवाज़ देते सुना,

"अरे सुनो, वरुण का फोन है जल्दी आओ... हाँ बेटा वरुण कैसे हो बेटा, अच्छा हुआ जो तुमने फोन किया सुबह से तुम्हारी माँ का जी घबरा रहा था, कह रही थी कल रात अजीब सपना देखा..."

बाबूजी कुछ कह पाते तभी उसे माँ की हाँफती आवाज़ सुनाई दी, लगता है माँ तेज़ कदमों से चलकर आई थी जिस वजह से उसकी साँस फूल गयी थी।

"अब दो भी न, हटो पहले मुझे बात करने दो... वरुण, कैसा है बेटा? तू ठीक तो है न?"

"हाँ माँ में बिल्कुल ठीक हूँ, अभी बैंक से आया तो सबसे पहले आपको फोन किया, जाने क्यों सुबह से..."

कहते हुए वरुण चुप हो गया कि कहीं वो दोनों गलत समझ के घबरा न जाएं।

"क्या सुबह से वरुण? तू सच कह रहा है न! ठीक तो है न बेटा, ये मुआ फोन भी आधे दिन ठीक रहता है आधे दिन ख़राब, कबसे तेरे बाबूजी को बोला है कि इसे बदलवा दें लेकिन सुनते कहां हैं मेरी, रात सपना देखा तू छोटा बच्चा बन गया है वापस और रो रहा है, तबसे ही तुझे फोन करने की कोशिश कर रही थी लेकिन ये कम्बख़त...."

"माँ, माँ, मैं ठीक हूँ बिल्कुल, बस अचानक ये काम बढ़ जाने के कारण इतने दिनों से बात नहीं कर पाया, आप और बाबूजी तो ठीक हैं न? कोई समस्या तो नहीं?"

"समस्या! वैसे तो कोई खास समस्या नहीं लेकिन एक ही बड़ी समस्या है, अकेलापन, अब इस उम्र में अकेलापन खलता है, तू वहाँ अकेला और हम यहाँ..."

कुछ देर दोनो तरफ चुप्पी छाई रही फिर वरुण ने कहा।

"मैं आ रहा हूँ माँ, अब हम अपने अकेलेपन को और नहीं बढ़ने देंगे, आप और बाबूजी तैयारी कर के रखियेगा, अबसे इस खाली मकान में आवाज़ों का बसेरा होगा।"

"खाली मकान, आवाज़ें! ये क्या बोल रहा है?"

"कुछ नहीं माँ, मैं काल शाम तक आ जाऊँगा, आप और बाबूजी तैयार रहना।"

इतना कह वरुण ने फोन रखा, और दूसरे ही दिन अपने माँ बाबूजी को शहर ले आया, अब जब भी वो काम पर जाते समय एक आवाज़ पर पलट के देखता है तो उसे खाली मकान नहीं दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा कर उसे विदा करती उसकी माँ दिखती है।

Thursday, March 2, 2017

लड्डू गोपाल (कहानी)

शाम का समय था, राधेश्याम तिवारी अपनी झोपडी के सामने बैठे थे घर की मालकिन (तिवारी जी की धर्मपत्नी) रसोई घर में पकवान बनाने में व्यस्त थी, वो क्या है उनके एकलौते बेटे श्याम का आज जन्मदिन था जो वर्षो पहले शहर जाकर बस गया था, बेटे ने भले ही याद ना किया हो लेकिन माँ कैसे भूल सकती है, तिवारीन अपनी ही दुनिया में खोई थी,
  "अरे सुनती हो, अपनी ठकुराइन आई है जरा जरा एक थाली परोसो.." तिवारी जी ने बाहर से ही आवाज लगाई, थाली लगाने को सुनते ही तिवारीन की गुस्सा देखने लायक था होता भी क्यों ना अभी भगवान का भोग भी नही लगाया था वो भी आज के शुभ दिन, लेकिन मन मसोस कर रह गयी कहती भी किसे, तिवारी जी तो बाहर बैठे थे,
तिवारीन थाली लगा कर बेमन से ठकुराइन को देकर वापस अपने काम में मग्न हो गयी, ठकुराइन ने बड़े मन से पेट की ज्वाला शांत की और तिवारी जी के बेटे को हजारो आशीर्वाद देते हुए अपने रास्ते बढ़ गयी,
थाली रखने की आवाज सुनते ही तिवारीन भुनभुनाते हुए घर से निकली और तिवारी जी पर बरस पड़ी,
"तुम्हे कुछ पता भी है घर संसार का... अभी मैंने अपने लड्डूगोपाल का भोग भी नही लगाया था, प्रसाद भी नही चढ़ाया था आज इतने शुभ दिन मेरे लड्डूगोपाल को उपवास ही रखना पड़ेगा अब झूठी रसोई से तो प्रसाद निकालूंगी नही," सारा गुस्सा एक ही साँस में उड़ेलते हुए बोली,
तिवारी जी शांत मन से मुस्कुराते हुए बोले  "अरी भाग्यवान सुन तो, तू तो जानती ही अभी पिछले महीने ही ठाकुर साहब का देहांत हुआ है, तभी उनके दोनों नालायको ने सारी जायजाद संपत्ति के साथ साथ अपनी माँ का भी बटवारा कर लिया था, फरवरी में तो 28 दिन थे दोनों ने 14 14 दिन खिला दिया, लेकिन मार्च में 15 15 दिन तो दोनों ने खिला दिया लेकिन आज सुबह से किसी ने पूछा तक नही, दोपहर मंदिर से आते हुए मिली थी ठकुराइन की ये हालत मुझ से देखि ना गयी बस इसीलिये बुला बैठा, अब तू ही बोल तेरे पत्थर के भगवान तो एक वक्त का उपवास सह लेंगे लेकिन ये बूढ़े हाड़ मांस की देह सह पाती क्या...."
तिवारीन वहीँ दिवार के सहारे टिक गयी और आँखों से बस एक बूंद टपकने को बेकरार थी...