Thursday, March 2, 2017

लड्डू गोपाल (कहानी)

शाम का समय था, राधेश्याम तिवारी अपनी झोपडी के सामने बैठे थे घर की मालकिन (तिवारी जी की धर्मपत्नी) रसोई घर में पकवान बनाने में व्यस्त थी, वो क्या है उनके एकलौते बेटे श्याम का आज जन्मदिन था जो वर्षो पहले शहर जाकर बस गया था, बेटे ने भले ही याद ना किया हो लेकिन माँ कैसे भूल सकती है, तिवारीन अपनी ही दुनिया में खोई थी,
  "अरे सुनती हो, अपनी ठकुराइन आई है जरा जरा एक थाली परोसो.." तिवारी जी ने बाहर से ही आवाज लगाई, थाली लगाने को सुनते ही तिवारीन की गुस्सा देखने लायक था होता भी क्यों ना अभी भगवान का भोग भी नही लगाया था वो भी आज के शुभ दिन, लेकिन मन मसोस कर रह गयी कहती भी किसे, तिवारी जी तो बाहर बैठे थे,
तिवारीन थाली लगा कर बेमन से ठकुराइन को देकर वापस अपने काम में मग्न हो गयी, ठकुराइन ने बड़े मन से पेट की ज्वाला शांत की और तिवारी जी के बेटे को हजारो आशीर्वाद देते हुए अपने रास्ते बढ़ गयी,
थाली रखने की आवाज सुनते ही तिवारीन भुनभुनाते हुए घर से निकली और तिवारी जी पर बरस पड़ी,
"तुम्हे कुछ पता भी है घर संसार का... अभी मैंने अपने लड्डूगोपाल का भोग भी नही लगाया था, प्रसाद भी नही चढ़ाया था आज इतने शुभ दिन मेरे लड्डूगोपाल को उपवास ही रखना पड़ेगा अब झूठी रसोई से तो प्रसाद निकालूंगी नही," सारा गुस्सा एक ही साँस में उड़ेलते हुए बोली,
तिवारी जी शांत मन से मुस्कुराते हुए बोले  "अरी भाग्यवान सुन तो, तू तो जानती ही अभी पिछले महीने ही ठाकुर साहब का देहांत हुआ है, तभी उनके दोनों नालायको ने सारी जायजाद संपत्ति के साथ साथ अपनी माँ का भी बटवारा कर लिया था, फरवरी में तो 28 दिन थे दोनों ने 14 14 दिन खिला दिया, लेकिन मार्च में 15 15 दिन तो दोनों ने खिला दिया लेकिन आज सुबह से किसी ने पूछा तक नही, दोपहर मंदिर से आते हुए मिली थी ठकुराइन की ये हालत मुझ से देखि ना गयी बस इसीलिये बुला बैठा, अब तू ही बोल तेरे पत्थर के भगवान तो एक वक्त का उपवास सह लेंगे लेकिन ये बूढ़े हाड़ मांस की देह सह पाती क्या...."
तिवारीन वहीँ दिवार के सहारे टिक गयी और आँखों से बस एक बूंद टपकने को बेकरार थी...

No comments:

Post a Comment