Sunday, August 18, 2019

काँवड़ यात्रा : मेरा अनुभव

काँवड़ यात्रा : मेरा अनुभव

#भाग_३
#पहला_दिन #हरिद्वार_से_नारसन
#भाग_२ से आगे

अभी तक आपने पढ़ा #भाग_१ में काँवड़ यात्रा की तैयारी, और #भाग_२ में दिल्ली से हरिद्वार पहुंचने का वर्णन, अब आगे

हर की पैड़ी पहुंचते ही गंगा मैया के दर्शन कर रात भर भीड़ भारी ट्रेन में खड़े होकर यात्रा करने की  थकान गायब हो गयी थी, गंगा मैया का जयकारा लगा कर हर की पैड़ी घाट पर पहला कदम रखा, ट्रेन में मिले सहयात्री ताऊ के साथ अब तक एक मौन समझौता हो गया था, क्योंकि जरूरत दोनो की थी, तो एक दूसरे के सामान की देख रेख और सहयोग से हम दोनों ने बारी बारी से गंगा स्नान किया, मैं काँवड़ यात्रा में बिल्कुल नया था तो मैं बस ताऊ की नकल कर रहा था, नहा धोकर, गंगा जल भरा और दीपक जलाया, प्रसाद चढ़ाया और गंगा जल कंधे उठाकर भोले का नाम लेकर काँवड़ यात्रा शुरू कर दी, समय था सुबह दो बजकर पंद्रह मिनट,
घाट छोड़ने से पहले एक सेल्फी भी ली,
यात्रा के शुरू में ही ताऊ ने अपने किस्से सुनाने शुरू कर दिए थे तो मुझे सुनते जाना था, ऐसे भी मैं कम ही बोलता हूँ तो मेरे पास सुनाने को कुछ था भी नही,
ताऊ जब भी रास्ते मे तेज चलते या ज्यादा जल लेकर चलते काँवड़ यात्रियों को देखता तो मुझे हर बार बताता की इन सब की दुर्गति होने वाली है, अभी जोश है इसलिए दौड़ रहे है इतना वजन लेकर ज्यादा नही जा पाएंगे, ये ताऊ का वर्षो का अनुभव था,
घर से मिली नसीहतों को ताऊ के ज्ञान से इतना अंदाज मुझे भी हो गया था कि मुझे किसी भी हालत में जल्दबाजी नही करनी है, अपनी चाल से चलना है, खैर बातो बातो में पहले ही झटके में कब रेलवे स्टेशन वापस निकला, कब रानीपुर मोड़, कब ज्वालापुर गया ये बस पता ही नही चला समझो, पहले ही झटके में हम सीधे बहादराबाद पहुंच गए,
अब तक रास्ते मे हमे चलते हुए यात्री मिल रहे थे लेकिन यहां डीजे काँवड़, डाक काँवड़, का जमावडा लगा हुआ था, सड़क पूरी तरह जाम थी, सड़क और आसपास काँवड़ यात्रियों की गाड़ियां लगी हुई थी, वही सबका खाना पीना नहाना धोना सोना चल रहा था,
यहां तक आते आते और आराम करती जनता को देख मुझे थकान वापस महसूस होने लगी थी तो मैंने रुकने को बोला, हमने भी वही एक चाय की दुकान पर दो खाली कुर्सी देखकर थोड़ा आराम किया ये ही कोई पांच मिनट,
कारण था हर ओर जंगली भेडियो का प्रकोप, ( जंगली भेड़िये सड़क किनारे अंधेरे में पानी की बोतल के साथ पाई जानी वाली दो चमकीली आंखों वाली एक विशेष प्रजाति है )
वहां थोड़ा आराम करने के बाद जल्दी ही दोबारा काँवड़ यात्रा शुरू हुई इस बार मेरी चलने की रफ्तार पहले से कम हो चुकी थी, अब ताऊ मुझे थोड़ा आगे चल रहे ठगे और मैं थोड़ा पीछे, एक दो किमी चलने के बाद थोड़ा उजाला होना शुरू हो गया था सड़क किनारे लगने वाली दुकाने सजने लगी थी, कल दोपहर से कुछ खाया नही था तो मुझे भूख लगने लगी थी, सड़क किनारे एक चाय के स्टाल पर पकोड़ी के लिए बेसन घोलते एक दुकानदार को देख मैं फिर से रुक गया,
एक प्लेट पकोड़ी और दो चाय बोलकर हम वहीं बैठ गए इंतजार में, चाय पकोड़ी का इंतजार करते एक दो और कांवड़ियों से जान पहचान और थोड़ी बातचीत हुई सब अपने अपने अनुभव बता रहे थे गत वर्षों के एक मैं ही था जिसके पास पुराना कुछ नही था बताने को, तो मैं सवका ज्ञान सुनकर आने वाली यात्रा के लिए संजो रहा था,
चाय पकौड़ी बनकर आ गयी थी, अब लग रहा था कि यहां बैठकर गलती कर दी, कारण चाय और पकोड़ी की शक्ल और स्वाद, जैसे तैसे खत्म की और आगे बढ़ गए,
दिन निकलने के साथ ताऊ की रफ्तार तेज और मेरी धीमी होती जा रही थी, अब ताऊ कब कहाँ मेरी नजरो से ओझल हुए पता नही चला मैं अपनी चींटी की चाल से चलता रहा,
समय फिन के करीब ११ बज गए थे अब अगला लक्ष्य रुड़की दिख रहा था, इसी बीच मुझे ताऊ दोबारा दिखे लेकिन इस बार मैं तो को इग्नोर कर आगे बढ़ गया, थोड़ा आगे जाने पर मुझे एक नया साथी मिल गया, नाम संदीप उपाध्याय, पेशे से अध्यापक, पड़ोसी गाँव खेड़ी के निवासी, संदीप से पहली मुलाकात चाय पकोड़ी के स्टाल अपर हुई थी, उनके साथी उन्हें छोड़कर फरार हो चुके थे अब वो भी अकेले थे और मैं भी, तो अब हम दोनों साथ हो लिए, रुड़की पहुंचने से करीब ३-४ किमी पहले हम भी चाय के लिए , हम चाय के लिए रुके और बारिश शुरू हो गयी जोकि करीब डेढ़ दो घंटे चली, हम जहां रुके थे वहां भी बारिश  से बचने का कोई खास इंतजाम नही था, जैसे तैसे थोड़ा भीगे थोड़ा बचते हुए हमने वहां समय पूरा किया बारिश का, बारिश रुकते ही अब हम दोबारा चल पड़े, लक्ष्य अभी भी रुड़की ही था,

रुड़की पहुंचने की खुसी थी हम दोपहर तक रुड़की आ चुके थे, घर से चलने से पहले किसी ने कहा था पहले दिन रुड़की पहुंचना भी भारी हो जाता था हमारे पास अभी भी आधा दिन था, लेकिन अब हम तक चुके थे रुड़की में घुसते ही मेरी नजर किसी आराम करने लायक ठिकाने को ढूंढती चल रही थी, जहाँ मैं लेट कर कमर सीधी कर सकूं, जल्दी ही मेरी तलाश पूरी हुई, एक रेस्टोरेंट /ढाबे वाले ने अपने रेस्टोरेंट के साथ बड़े से हाल बरामदे में कांवड़िया के रुकने का इंतजाम किया हुआ था, साफ सुथरी जगह थी, ज्यादा भीड़ भी नही थी, मैंने संदीप को बोला यहीं आराम करते है दोपहर में अब शाम को चलेंगे, वो भाई मुझसे पहले ही थका हुआ था, वो भी तुरंत राजी हो गया,

Saturday, March 25, 2017

कदम दरवाजे से बाहर रखने ही वाला था कि पीछे से किसी ने आवाज़ दी,

"रुको."

वरुण ने पलट के देखा तो कोई नहीं था, होता भी कैसे! खाली मकान था और खाली मकानों से कहीं आवाज़ें आती हैं भला! वहम होगा सोच कर उसने दरवाजे पर ताला लगाया और गली पार कर सड़क पर आया ही था कि मोटर सायकल से टकराते हुए बचा, कुछ देर पहले की बात और माँ की कही हुई बात याद आ गयी कि जाते हुए को पीछे से आवाज़ देना अशुभ होता है, लेकिन वहाँ तो कोई नहीं था फिर आवाज़ कैसे आयेगी, या सच में ही किसी ने पुकारा था! पता नहीं क्या था ख़ैर जो भी हो उसे बैंक जल्दी पहुँचना था, हाल ही में हुए तबादलों की वजह से उसका काम बढ़ गया था।

बैंक में भी दिनभर काम में उलझा रहा, कभी अच्छे से बोलता तो कभी किसी छोटी सी बात पर खीज उठता, जब तक काम में व्यस्त रहता तब तक तो ठीक लेकिन जैसे ही फुर्सत मिलती फिर सुबह वाली घटना याद आ जाती।

ख़ैर दिन बीता और काम से लौट कर घर आया, जैसे ही दरवाज़ा खोला सामने वाली दीवार पर लगी माँ बाबूजी के साथ वाली तस्वीर दिखी जो थोड़ी तिरछी हो गयी थी, धीमे क़दमों से तस्वीर के पास पहुँचा, गौर से देखा, उसी पल सुबह की घटना और वो आवाज़ पहचान में आ गयी, घबरा गया अन्जानी आशंका से, फ़ौरन तस्वीर सीधी की और गाँव में माँ बाबूजी को फ़ोन लगाया 6-7 बार बजने के बाद उसके बाबूजी की आवाज़ दूसरी तरफ गूँजी,

"हेल्लो, कौन?"

"बाबूजी, प्रणाम, मैं वरुण..."

इतना ही कह पाया कि उसने बाबूजी को ज़ोर से आवाज़ देते सुना,

"अरे सुनो, वरुण का फोन है जल्दी आओ... हाँ बेटा वरुण कैसे हो बेटा, अच्छा हुआ जो तुमने फोन किया सुबह से तुम्हारी माँ का जी घबरा रहा था, कह रही थी कल रात अजीब सपना देखा..."

बाबूजी कुछ कह पाते तभी उसे माँ की हाँफती आवाज़ सुनाई दी, लगता है माँ तेज़ कदमों से चलकर आई थी जिस वजह से उसकी साँस फूल गयी थी।

"अब दो भी न, हटो पहले मुझे बात करने दो... वरुण, कैसा है बेटा? तू ठीक तो है न?"

"हाँ माँ में बिल्कुल ठीक हूँ, अभी बैंक से आया तो सबसे पहले आपको फोन किया, जाने क्यों सुबह से..."

कहते हुए वरुण चुप हो गया कि कहीं वो दोनों गलत समझ के घबरा न जाएं।

"क्या सुबह से वरुण? तू सच कह रहा है न! ठीक तो है न बेटा, ये मुआ फोन भी आधे दिन ठीक रहता है आधे दिन ख़राब, कबसे तेरे बाबूजी को बोला है कि इसे बदलवा दें लेकिन सुनते कहां हैं मेरी, रात सपना देखा तू छोटा बच्चा बन गया है वापस और रो रहा है, तबसे ही तुझे फोन करने की कोशिश कर रही थी लेकिन ये कम्बख़त...."

"माँ, माँ, मैं ठीक हूँ बिल्कुल, बस अचानक ये काम बढ़ जाने के कारण इतने दिनों से बात नहीं कर पाया, आप और बाबूजी तो ठीक हैं न? कोई समस्या तो नहीं?"

"समस्या! वैसे तो कोई खास समस्या नहीं लेकिन एक ही बड़ी समस्या है, अकेलापन, अब इस उम्र में अकेलापन खलता है, तू वहाँ अकेला और हम यहाँ..."

कुछ देर दोनो तरफ चुप्पी छाई रही फिर वरुण ने कहा।

"मैं आ रहा हूँ माँ, अब हम अपने अकेलेपन को और नहीं बढ़ने देंगे, आप और बाबूजी तैयारी कर के रखियेगा, अबसे इस खाली मकान में आवाज़ों का बसेरा होगा।"

"खाली मकान, आवाज़ें! ये क्या बोल रहा है?"

"कुछ नहीं माँ, मैं काल शाम तक आ जाऊँगा, आप और बाबूजी तैयार रहना।"

इतना कह वरुण ने फोन रखा, और दूसरे ही दिन अपने माँ बाबूजी को शहर ले आया, अब जब भी वो काम पर जाते समय एक आवाज़ पर पलट के देखता है तो उसे खाली मकान नहीं दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा कर उसे विदा करती उसकी माँ दिखती है।

Thursday, March 2, 2017

लड्डू गोपाल (कहानी)

शाम का समय था, राधेश्याम तिवारी अपनी झोपडी के सामने बैठे थे घर की मालकिन (तिवारी जी की धर्मपत्नी) रसोई घर में पकवान बनाने में व्यस्त थी, वो क्या है उनके एकलौते बेटे श्याम का आज जन्मदिन था जो वर्षो पहले शहर जाकर बस गया था, बेटे ने भले ही याद ना किया हो लेकिन माँ कैसे भूल सकती है, तिवारीन अपनी ही दुनिया में खोई थी,
  "अरे सुनती हो, अपनी ठकुराइन आई है जरा जरा एक थाली परोसो.." तिवारी जी ने बाहर से ही आवाज लगाई, थाली लगाने को सुनते ही तिवारीन की गुस्सा देखने लायक था होता भी क्यों ना अभी भगवान का भोग भी नही लगाया था वो भी आज के शुभ दिन, लेकिन मन मसोस कर रह गयी कहती भी किसे, तिवारी जी तो बाहर बैठे थे,
तिवारीन थाली लगा कर बेमन से ठकुराइन को देकर वापस अपने काम में मग्न हो गयी, ठकुराइन ने बड़े मन से पेट की ज्वाला शांत की और तिवारी जी के बेटे को हजारो आशीर्वाद देते हुए अपने रास्ते बढ़ गयी,
थाली रखने की आवाज सुनते ही तिवारीन भुनभुनाते हुए घर से निकली और तिवारी जी पर बरस पड़ी,
"तुम्हे कुछ पता भी है घर संसार का... अभी मैंने अपने लड्डूगोपाल का भोग भी नही लगाया था, प्रसाद भी नही चढ़ाया था आज इतने शुभ दिन मेरे लड्डूगोपाल को उपवास ही रखना पड़ेगा अब झूठी रसोई से तो प्रसाद निकालूंगी नही," सारा गुस्सा एक ही साँस में उड़ेलते हुए बोली,
तिवारी जी शांत मन से मुस्कुराते हुए बोले  "अरी भाग्यवान सुन तो, तू तो जानती ही अभी पिछले महीने ही ठाकुर साहब का देहांत हुआ है, तभी उनके दोनों नालायको ने सारी जायजाद संपत्ति के साथ साथ अपनी माँ का भी बटवारा कर लिया था, फरवरी में तो 28 दिन थे दोनों ने 14 14 दिन खिला दिया, लेकिन मार्च में 15 15 दिन तो दोनों ने खिला दिया लेकिन आज सुबह से किसी ने पूछा तक नही, दोपहर मंदिर से आते हुए मिली थी ठकुराइन की ये हालत मुझ से देखि ना गयी बस इसीलिये बुला बैठा, अब तू ही बोल तेरे पत्थर के भगवान तो एक वक्त का उपवास सह लेंगे लेकिन ये बूढ़े हाड़ मांस की देह सह पाती क्या...."
तिवारीन वहीँ दिवार के सहारे टिक गयी और आँखों से बस एक बूंद टपकने को बेकरार थी...

Tuesday, December 20, 2016

मन के अंधेरे कोने से...

चलो आज एक राज को किस्सा बनाता हूँ जो आज तक मेरे मन के काले कोने में कहीं दफन था उसे काली स्याही में उतारता हूँ,

तो बात उन दिनों की है मैं कक्षा 11 का छात्र था, गाँव से 20 किलोमीटर दूर शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में दाखिला कराया था पापा ने, बड़ी उम्मीदे थी शायद मुझसे, हो भी क्यों ना घर में सबसे पहला था जिसने दसवीं की बोर्ड परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी (भले ही दूसरे प्रयास में 😢😢)

मैं छोटा सा बालक, पढाई में साधारण, अंतर्मुखी,
रोजाना सुबह 5 बजे उठ कर, तैयार होकर गाँव से 3 किमी दूर साइकिल चला कर जाता और 5:45 वाली पहली बस से रोज स्कूल जाता (कभी छत पर बैठ कर कभी खिड़की पर लटक कर), 7 बजे स्कूल जो पहुंचना होता था, स्कूल भी अनुसाशन में नंबर वन, सात से सात पांच हुए नही की एंट्री बंद, मतलब पहली बस छूती तो सारी मेहनत बेकार, कक्षा 8 तक हमेशा टॉप करने वाला, दसवीं तक भी क्लास के अच्छे बच्चों में गिने जाने वाला शहर के स्कूल की भीड़ में कहीं खो गया, ना खुद की कोई पहचान बची, ना दोस्त ना अध्यापक, एकदम अकेला हो गया था नये स्कूल में जाकर, शहर के इंग्लिश बोलने वाले बच्चों / अध्यापको से ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों के सामने खुद को एकदम तुच्छ समझने लगा था, करता भी क्या रोज की भागदौड़ में ना कुछ सोचने का समय था ना कुछ करने का, बस इसीतरह चल रहा था सबकुछ कब तीन महीने निकल गए पता ही नही चला और त्रैमासिक परीक्षा शुरू हो गयी,
परीक्षा थी भाग तो सकते नही थे हमने भी दी, परिणाम हमारी मेहनत और उम्मीद से कहीं बुरा था, मतलब कुल 5 विषयो में से  दो ( अँग्रेजी और भौतिकी)  में हम फेल हो चुके थे... मतलब आधी हिम्मत जवाब दे चुकी थी, घर वालो को कैसे बताया ये अब याद नही, वैसे फेल होने वाला मैं अकेला नही था क्लास के ज्यादातर बच्चे फेल ही थे, लेकिन मेरे लिए ये किसी सदमे से कम नही था, मतलब शाम को जो थोड़ा बहुत समय मेरे लिए होता था अब उसमे भी पढाई होने लगी पढाई कुछ नही बस शहर के बच्चों की देखा देखी रंगीन नोट्स बनाने शुरू किये, जिन दो विषयो में फेल हुआ उनपर थोड़ा ज्यादा ध्यान देना शुरू किया, मतलब अब दोस्त और खेल बिलकुल छूट चके थे जिनसे पहले भी कोई खास वास्ता नही था मेरा,
अब तक साथ में जाने वालों एक दो लड़को से थोड़ी जान पहचान भी हो गयी थी जोकि रास्ते में पड़ने वाले एक गाँव से मेरे ही कॉलेज जाते थे,
अब आ गयी छमाही परीक्षा, पूरी हिम्मत से परीक्षा दी
परिणाम इस बार फिर हमारी उम्मीदों से परे था  लेकिन अब तक उसे सहने की हिम्मत जुटा ली थी, इस बार भी हम दो विषयो ( गणित और रसायन) में लुढ़क चुके थे लेकिन संतुष्टि ये थी कि जिन दो विषयो में त्रैमासिक में हम डूबे थे उन विषयो में अपनी मेहनत से हम ठीक ठाक अंको से पास हो गए थे, लेकिन बार के परिणाम को स्वीकार करना घर वालो के लिए थोड़ा मुश्किल था, घर वालो में अब मुझे भी ट्यूशन भेजने का मन बना लिया था यो घर के पास ही एमएससी के एक छात्र के पास हम भी ट्यूशन पढ़ने जाने लगे,  और ट्यूशन का समय था सुबह स्कूल जाने से पहले मतलब सुबह 4 बजे से 5 बजे तक, जिंदगी और मुश्किल होती जा रही थी रोज लेकिन मरता क्या ना करता, अपनी और घर वालो की इज्जत का सवाल था, कुछ भी करके पास होना था. मासिक परीक्षाओं का दौर जारी था और मेरी हालात बद से बदतर होती जा रही थी,

अब आते असली मुद्दे पर मतलब सालाना परीक्षा, पहली ही परीक्षा गणित की थी, पेपर से पहले 3 दिन की छुट्टी भी थी, आखिर कर परीक्षा की घड़ी आ गयी और पेपर देखते ही हमारे दिमाग का बल्ब बुझ चूका था, आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा था , मुश्किल से 15 से 20 नम्बर का पेपर आता होगा, छमाही में पहले ही फेल हो चुके थे सालाना में भी पास होने की उम्मीदे टूट चुकी थी, आए थे इस उम्मीद से की छमाही सालाना दोनों मिलाकर पास हो जाएंगे लेकिन अब सब कुछ ख़त्म हो चूका, परीक्षा के दौरान ही एक नोटिस आता है कि अपना कक्षा 10 का प्रमाणपत्र लाना है और तुरंत ही हमारे दिमाग में चाचा चौधरी की तरह एक प्लान आया इस फेल होने के झमेले से बचने का....

घर परिवार सबसे दूर जाने का प्लान....

घर वालो सामना करने की हिम्मत अब नही बची थी, स्कूल से निकला सड़कों पर घूमता रहा... शाम हुई शाम तक आत्महत्या का फैसला कर लिया था, रेलवे लाइन रास्ते में ही पड़ती थी  तो पहुँच गये, बस्ती से थोड़ा आगे निकला अँधेरा हो चुका था आँखे बंद करके लेट गया पटरी पर गर्दन रखकर, करीब एक घंटा इंतज़ार करने के बाद भी कोई ट्रैन नही आई अब तक ना शरीर में ताकत बची थी ना सोचने समझने की शक्ति, पैदल ही अब रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़ा रात हो चुकी थी, स्टेशन पर एक ट्रेन खड़ी थी बिना टिकट लिए जाकर बैठ गया बिना देखे की ट्रेन कहाँ जा रही है, रात के करीब 12 बजे ट्रेन दिल्ली पहुंची, दिल्ली अंतिम स्टेशन था कुछ समझ नही आया तो सामने खड़ी दूसरी ट्रेन में चढ़ गया रात का समय था ऊपर वाली सीट पर चुपचाप लेट गया, दिन भर की शारीरिक और मानसिक थकान की वजह से कब नींद आ गयी पता नही चला,  सुबह जब नींद खुली तो ट्रेन भिवानी हरियाणा में थी, वो भी अंतिम स्टेशन था, ट्रेन से उतर कर प्लेटफॉर्म पर बैठ गया, अब भूख ने फिर दस्तक देनी शुरू की, जेब में देखा तो कुल 43 रूपये थे, 10 रूपये के समौसे खाकर पेट की आग को शांत किया, लेकिन दिमाग की आग अभी भी जल रही थी,
  आगे क्या करना है कुछ समझ नही आ रहा था, परेशान हालत में प्लेटफॉर्म पर बैठा था, तभी बगल वाले सीट पर एक आदमी आकर बैठ गया, जिसने मुझसे बात करनी शुरू की, मैंने उसे बोल दिया की यहाँ किसी काम से आया हूँ अगली ट्रैन से वापस जा रहा हूँ लेकिन शायद वो मुझे देख कर अंदाज लगा चुका था इसलिए बात करता गया, शाम तक वहां कोई ट्रैन नही थी इसीलिये उसने बोला की मेरा घर पास ही है उसके घर उसके साथ चलने को, और मैं उसकी बातों में आ गया था मैं उसके साथ हो लिया, स्टेशन से थोड़ा ही आगे जाकर एक कच्ची सी कॉलोनी में उसका घर था जिसपर ताला लटका हुआ था, उसने बताया उसका परिवार गाँव में रहता है

Monday, December 12, 2016

सोनम गुप्ता बेवफा है

''इलाके में किसी से भी पूछ लेना कि झब्बू चौक किधर है बस वहीं से लेफ्ट ले लेना।''

कुछ ऐसा रौब है अपने झब्बू भैया का। झब्बू भैया पेशे से ऑटो चलाते हैं मगर इलाके में किसी के घर में बच्चा जन्मने से लेकर किसी के स्वर्ग निकलने तक की खबर सबसे पहले झब्बू भैया के पास ही आती है और फिर झब्बू भैया के अप्रूवल के बाद ही वो खबर सार्वजानिक होती है। झब्बू भैया इतने फेमस है कि उनके घर के सामने वाला चौक ''झब्बू चौक'' के नाम से जाना जाता है। मोहल्ले के बच्चो के वो चाचा नेहरु हैं तो मोहल्ले की कलियों के लिए इमरान हाशमी और हमउम्र लौंडों के लिए एंग्री यंग मैन यानी अमिताभ बच्चन।

विमुद्रीकरण के पूरे दो दिन बाद आज बैंकों और एटीएम में लम्बी कतार थी और इलाके में सिर्फ एक एटीएम होने के चलते दूर दराज़ से लोगों का ताँता लगा हुआ था। झब्बू भैया के बिज़नस की तो जैसे निकल पड़ी थी, दूर दराज़ से लोगों को एटीएम तक लाते और फिर ले जाते।

इसी चहल पहल में एक खूबसूरत सी लड़की उनके ऑटो में आकर बैठी और एटीएम की तरफ चलने का इशारा किया। झब्बू भैया ने इतनी खूबसूरत लड़की अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखी थी तो अब चांस लेने की कोशिश करने का फाइनल कर लिया।

''कितना हुआ भैया?'' एटीएम पहुंच कर लड़की ने सवाल किया।

''जी, वैसे तो किराया दस रुपये है मगर अगर आप अपने सवाल से भैया शब्द हटा लें तो फ्री सेवा समझ लीजिये।'' झब्बू भैया ने अपने स्टड अवतार में जवाब दिया।

लड़की ज़रा सी मुस्कुराई और जा कर एटीएम की कतार में खड़ी हो गई। झब्बू भैया भी मुस्कुराहट को हरी झंडी समझ ऑटो किनारे लगाकर साहिबा के पीछे कतार में खड़े हो गए।

फिर क्या था, दोनों की बातें शुरू हो गईं। जैसे जैसे कतार आगे बढ़ रही थी वैसे वैसे बातें भी गहरी होती जा रही थीं और फॉर्मल से इन्फोर्म्ल टॉपिक्स पर जा पहुंची थीं। इसी बीच झब्बू भैया ने मैडम को जाल में फंसते देख नारियल पानी भी पिला दिया था। वक़्त बीतता रहा और झब्बू भैया प्यार के सागर में टाइटैनिक चलाने लग गए।

परेशान भीड़ में अगर कोई खुश था तो वो थे हमारे झब्बू भैया! भीड़ आगे जल्दी ना बढ़े इसलिए जान बूझकर बूढ़े बुजुर्गों को अपने आगे लगाते और पीछे से कोई कुछ कहता तो देशप्रेम, संविधान और नैतिकता का भाषण देने लगते। इश्क में अंधे होने के साथ साथ मानो इश्क ने झब्बू भैया को पॉलिटिक्स, ह्यूमैनिटी और मोरल साइंस का ज्ञान भी दे दिया था।

वक़्त की मार के चलते अब वो घड़ी आ ही गई थी जब एटीएम में दाखिल होने की बारी झब्बू भैया की महबूबा की थी। वो अन्दर गई और पैसे हाथ में लेकर बाहर आते ही झब्बू भैया की तरफ चल दी। झब्बू भैया भी अपने DDLJ के शाहरुख़ की तरह हाथ फैलाकर आँखे बंद किये सोचने लगे कि अब उनकी महबूबा उनके गले लग कर बोलेगी, ''सरसों के खेत ना सही, यहीं इन लोगों के सामने एक रोमांटिक गाना गा लेते हैं।''

मगर नहीं।

कुछ दो मिनट तक आँखें बंद रखने के बाद झब्बू भैया ने आँखें खोलकर देखा तो पता लगा कि उनकी ''मैंने प्यार किया'' से पहले ही ''मैंने प्यार क्यों किया'' बन चुकी है। उनकी मल्लिका किसी और के गले से लगकर अपने नए 2000 रुपये के नोट के साथ सेल्फी खिंचा रही थी।

झब्बू भैया ने हिम्मत की और मैडम के पास जाकर सवाल किया, ''मिल गए पैसे?''

''यह कौन है डार्लिंग?'' सामने से एक नया सवाल बाउंस बैक हुआ।

''ओह! ये ऑटो वाले भैया हैं, इनके साथ ही तो आई हूँ मैं। और पता है क्या? भैया ने 10 रुपये किराया भी नहीं लिया।''

''दिस इस बैड सोनम डार्लिंग। यू शुड पे हिम।''

इतना कहते ही हट्टे कट्टे नौजवान ने अपनी जेब से दस का नोट निकालकर झब्बू भैया को पकड़ा दिया।

''शैल वी गो नाओ मिस्टर गुप्ता?''

''श्योर बेबी।''

इतना कहकर दोनों प्रेमी युगल बाइक में बैठ निकल लिए और झब्बू भैया और उनके ख्वाब समुन्दर में टाइटैनिक से डूब गए।

गुस्साए झब्बू भैया ने उस दस के नोट पर लिख दिया,

''सोनम गुप्ता बेवफा है''

और इस तरह झब्बू भैया का कट गया और सोनम गुप्ता बेवफा हो गई।

Sunday, December 11, 2016

सपनों का सौदागर

कल ट्रेन पकड़ी और पहुंच गया उस जिले में जहाँ उसका घर है । फिर वहाँ से बस ले कर उसके शहर की तरफ रुख कर लिया । भई जाता भी कैसे ना अब नही रहा जाता उसके बिना । ये बंदिशें सहना सच्चा प्रेम कर के भी चोरों जैसा अनुभव करना भाई बहनों की जली कटी बातें सुनना ये सब अब नही सहा जाता इसीलिए सोच लिया कि अब तो प्राणप्यारी के पिता जी से मिल कर सारी बात कह ही देनी है । मन बिल्कुल नही डरा प्यार की ताकत है भई बन्दे को झुकने नही देती ।

मैं भी उसी हिम्मत से भरा हुआ पहुंच गया प्राणप्यारी के घर । वहीं से उसे फोन किया, उसने फोन उठाते ही शेरनी की तरह दहाड़ा "कितनी बार कहा है मम्मी घर पर होती हैं तो ऐसे फोन मत किया करो, पकड़े गए तो फोन छीन लेंगी । तुमको तो फर्क भी नही पड़ेगा हम तड़पते रह जाऐंगे ।"

हमने भी तैश में आ कर एक डायलाॅग घुमा के मारा "उसी तड़प को खत्म करने आऐ हैं तुम्हारे सहर, तुम्हारे पप्पा से तुम्हारा हाथ मांगने ।" हमारी बात सुनते ही प्राणप्यारी ऐसे डर गईं जैसे समाजवाद कमल का फूल देख कर चुनाव के नतीजे सोच कर डर जाता । मगर हम काहे डरें ना हम समाजवाद हैं ना उसके पप्पा कमल का फूल फिर काहे का डर । सुना नही क्या प्यार किया तो डरना क्या ?

"आप पगला गए हो क्या ? खुद भी मार खाओगे हमें भी खिलवाओगे । मेरी मानों हमको अपने सुंदर मुख का दीदार करा दो और इसे सही सलामत ले कर वापिस लौट जाओ । हम पप्पा का मूड देख कर उनसे बात करेंगे ना ।" प्राणप्यारी का मुझ पर इस तरह अविश्वास देख कर मेरे अंदर का ब्रहम्णत्व हिदुत्व देशभक्ती सब जाग गई । हमने कसम खा ली कि न अब तो सर्जिकल एस्ट्राईक हो कर रहेगा भले ही पिट कर आना पड़े । हमने फोन काट दिया और बढ़ गए ससुर जी की दुकनिया की तरफ । नोटबंदी का असर उन पर भी साफ दिख रहा था । गल्ले पर बैठे मक्खियां उड़ा रहे थे । शकल से तो भोले भाले लग रहे थे अब पता नही अंदर से कैसे हों । पर अब तो ओखली में मूड़ी धर दिए थे धमक से काहे डेराते ।

जाते ही चर्णस्पर्श किए । उन्होंने चौंक कर देखा फिर बोले "खुस रहिए, पर हमने आपको पहचाना नही आपका परिचय ?" मुंह से निकलने ही वाला था हम आपके दामाद मगर फिर हमको ख़याल आया कि मार खाने में इतनी जल्दबाजी करना सही नही है ।

कुछ सोच कर हमने कहा "सर, हम भारत सरकार की तरफ से सर्वे करने आए हैं ।"

"सर्वे ! कैसा सर्वे ?" ससुर जी चौंक गए

"जैसा की आप देख रहे हैं कि आज कल दहेज प्रताड़ना से लेकर बेवजह की बात पर तलाक तक में एक लड़की पिसती आ रही है । भारत सरकार इसी तरह के मामलों को कम करने के लिए एक सर्वे कर रही जिसके तहत हम उन सभी घरों में जाते हैं जिनके यहाँ बेटियाँ हैं और उनके माँ बाप के सामने ("माँ बाप के सामने" पर मैने सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया) उनसे कुछ सवाल पूछेंगे जिससे सरकार अंदाज़ा लगा सके कि कहीं इन सब घटनाओं के पीछे माँ बाप की खराब परवरिश ज़िम्मेदार तो नही ? कहीं उनसे उनकी मर्ज़ी के खिलाफ तो शादियाँ नहीं करवाई जा रहीं ? कहीं आपने अपनी बेटिओं को सिर्फ बेटियाँ समझ कर उनके मन को तो नही मारा ?" शायद जोश जोश में हम ज्यादा ही बोल गए । इसका अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब मेरी नज़र उनकी नज़रों से मिलीं जो मुझे घूर रही थीं ।

"हमने कभी ऐसे सर्वे के बारे में सुना नही पर फिर भी आपकी जानकारी के लिए बता दें ना हमने कभी अपनी बेटियों का मन मारा है, ना उनकी परवरिश में कोई कमी है । अच्छा खिलाया अच्छा पहनाया अच्छी शिक्षा दी अपनी तरफ से हर संभव सुविधा और सहूलतें दी हैं उन्हें ।"

"ये तो अच्छी बात है तब तो आपको कोई दिक्कत नही होगी अपनी बेटियों को बुलाने में और मेरे उनसे एक दो सवाल पूछने में ?" ससुर जी का पारा मानों सातवें आसमान पर था मगर शायद उनहोंने सोचा कि जब मैं सही हूँ तो फिर मिलवाने में क्या दिक्कत । बस फिर क्या था वो घर की तरफ चल दिए और पीछे पीछे हम भी लपक के चल दिए । घर पहुंचते उनहोंने अपनी बेटियों को बुलवाया पर उस वक्त उनकी एक ही बेटी यानी हमारी प्राणप्यारी ही घर पर थीं तो बस वही आईं । उन्हे मेरे जब्बर आईडिए का तनिक अंदाजा नही था इसलिए जब मुझे अपने पप्पा संग देखा तो उनकी तो मानो बेहोशी वाली हालत हो गई पर खुद को संभालते हुए वो अपने पप्पा के सामने आईं । तब ससुर जी ने सारी बात बताई । हमारी प्राणप्यारी जिस तरह हमें घूर रही थीं हमें पूरा विश्वास हो गया कि अगर हम अकेले मिल जाऐं तो ये हमें कच्चा ही चबा जाऐंगी । पर पप्पा के सामने तो अंजान बनाना ही था ।

"ये है मेरी बड़ी बेटी पूछिए क्या पूछना है ।" इस वक्त मुझे वैसा ही लग रहा था जैसे एक हिरण को दो आदमखोरों के बीच फंस कर लगता है । मगर हम भी आज मूड में थे । हमने भी तपाक से प्राणप्यारी से अंजान बनते हुए उनके बारे में मामुली जानकारी ली और फिर आँखों में देखते हुए एक सवाज दाग दिया ।
"ये आपकी आँखों के नीचे काले घेरे क्यों हैं ? क्या आपको नींद नही आती या कोई परेशानी है या आप रोती बहुत हैं ?" मैने इधर सवाल पूछा और उधर ससुर जी गुर्रा पड़े ।

"ये कैसा सवाल है ? उसे भला क्या परेशानी होगी ? मेरी बेटी है क्या मुझे इतना भी नही पता होगा कि परेशान है या नही ? सारा दिन हंसती रहती है । वो भला क्यों परेशान होने लगी ।"

"यही तो दिक्कत है सर, माँ बाप को हमेशा लगता है कि बच्चे खुश हैं पर कभी वो ये नही सोचते कि कभी बैठ कर बच्चे से पूछ ही लें कि तुम ठीक तो हो कोई दिक्कत तो नही कोई बात मन में है तो कहो । उन्हे अंदाज़ा ही नही होता कि उनकी बेटी के चेहरे कि मुस्कुराहट झूठी भी हो सकती है ।" ससुर जी अब थोड़े नर्म दिख रहे थे ।

"बताओ बेटी कोई परेशानी है तुम्हे ? कोई बात कहनी है ?" प्राणप्यारी जी अब असमंजस में थीं कि क्या कहें, कभी वो मेरा मुंह देख रही थीं तो कभी पप्पा का ।

"मैं बताता हूँ इन्हे शायद किसी से प्यार है । और यह बात बात ये आप से कह नही पा रहीं क्योंकि ये आपसे डरती है । वो पिता जिसकी क्षत्रछाया में बेटी हमेशा भयमुक्त महसूस करती रही आज वो आपसे डर रही है ।" इतना बोलना था कि ससुर जी रुद्र रूप में आगए ।

"तुम्हारा दिमाग खराब है लड़के । मेरी बेटी ऐसा नही कर सकती । उसकी शादी वहीं करेंगे जहाँ हम चाहेंगे । बताओ बेटी ऐसी कोई बात नही ना है ।" इस वक्त मुझे डरना चाहिए था मगर मुझे हंसी आ रही थी ज़ोर से जिसे मैं रोक नही पा रहा था । फिर भी संभलते हुए बोला

"कमाल है सर कनपट्टी पर पिस्तौल रख कर सच्च बताने को कहते हैं । इसीलिए तो डरती है आपसे । अच्छा सर ये सब छोड़िए आप यह बताइए आपने कभी पेड़ लगाया या लगवाया है सामने खड़े रह कर ?"

" अब ये कैसा सवाल है ? अब ये ना कहना कि तुम पेड़ों का सर्वे भी कर रहे हो कि किसने कितने पेड़ लगाए । वैसे हाँ बहुत पेड़ लगवाए और लगाए हैं ।"

"अच्छा तब तो आपने ये ज़रूर देखा होगा कि जब किसी पौधे को जबरदस्ती एक जगह से उखाड़ कर किसी दूसरी जगह फेंक दिया गया हो तो वो पौधा मुर्झाता है और फिर सड़ कर सूख जाता है ।"

"ये तो आम सी बात है कि जब पौधा उखाड़ कर फेंक देंगे तो मुर्झा कर सूख ही जाएगा ।"

"पर क्यों ? वो तो ज़मीन के संपर्क में ही है फिर भी क्यों सूख जाता है ?"

"अरे तुम पागल हो क्या ? पहले ज़मीन के अंदर था, उसे उसके मुताबिक पानी खनिज सब मिलता था जब उखाड़ा कर फेंका तो सतह पर आगया जहाँ उसे उसका भोजन नही मिला और वो सड़ गया ।"

"सर यही तो कहना चाह रहा था । एक पौधा जिसे उखाड़ दिया तो सूख गया तो वो लड़की कैसे जी पाएगी कैसे खुश रह पाएगी कैसे ना मुर्झाएगी जब आप उसे उस लड़के के दिल से निकाल कर किसी और के घर फेंक दोगे जिसके दिल में उसे प्यार मिलता है सुकून मिलता है जिसे उसने अपना जीवनसाथी मान लिया है । माना आपको उस लड़के कि परवाह ना हो मगर अपनी उस बेटी की तो होगी जिसे आपने नाज़ों से पाला है ।" ससुर जी अब शांत थे । उन्होंने मेरी प्राणप्यारी यानी अपनी बेटी की तरफ धीरे से ऐसे देखा मानों पूछ रहे हों मैं समझ गया अब तुम बताओ कोई है तो । प्राणप्यारी ने भी पप्पा का इशारा समझा और कुछ बोलने की बजाए मेरा हाथ पकड़ लिया ।

ससुर जी सब समझ गए की आखिर माजरा क्या है । क्यों ये सारा शहर छोड़ कर उनके ही घर सर्वे करने आया । ससुर जी हमारी तरफ मुस्कुराते हुए बढ़े और हमारा हाथ पकड़ कर एक दूसरे के हाथ में दे दिया । ये पल मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत पल था जिसे मैं वहीं रोक देना चाहता था आज मेरा सपना पूरा हो गया था और प्राणप्यारी तो मानो सातवें आसमान के पंद्रहवें माले पर थी । मैने प्राणप्यारी को गले से लगा लिया । 'मैं बहुत खुश था और तभी' रूममेट ने मुझे हिलाते हुए कहा "उठ जाओ धीरज भाई आज ऑफिस नही जाना क्या ? साढ़े नौ हो रहे हैं ।" मैं हड़बड़ा कर उठा आँखों को मला पर ये क्या यहाँ तो कोई नही था । ना ससुर जी ना प्राणप्यारी । मेरा पूरा हुआ सपना एक सपना ही था । प्राणप्यारी मेरी होते होते रह गई ।

अब मैं समझ ही नही पा रहा था हसूं या रो दूं । तभी मैं सोचूं मैं इतना कुछ कह गया और ससुर जी ने मेरी धुलाई क्यों नही की ।