चलो आज एक राज को किस्सा बनाता हूँ जो आज तक मेरे मन के काले कोने में कहीं दफन था उसे काली स्याही में उतारता हूँ,
तो बात उन दिनों की है मैं कक्षा 11 का छात्र था, गाँव से 20 किलोमीटर दूर शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में दाखिला कराया था पापा ने, बड़ी उम्मीदे थी शायद मुझसे, हो भी क्यों ना घर में सबसे पहला था जिसने दसवीं की बोर्ड परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी (भले ही दूसरे प्रयास में 😢😢)
मैं छोटा सा बालक, पढाई में साधारण, अंतर्मुखी,
रोजाना सुबह 5 बजे उठ कर, तैयार होकर गाँव से 3 किमी दूर साइकिल चला कर जाता और 5:45 वाली पहली बस से रोज स्कूल जाता (कभी छत पर बैठ कर कभी खिड़की पर लटक कर), 7 बजे स्कूल जो पहुंचना होता था, स्कूल भी अनुसाशन में नंबर वन, सात से सात पांच हुए नही की एंट्री बंद, मतलब पहली बस छूती तो सारी मेहनत बेकार, कक्षा 8 तक हमेशा टॉप करने वाला, दसवीं तक भी क्लास के अच्छे बच्चों में गिने जाने वाला शहर के स्कूल की भीड़ में कहीं खो गया, ना खुद की कोई पहचान बची, ना दोस्त ना अध्यापक, एकदम अकेला हो गया था नये स्कूल में जाकर, शहर के इंग्लिश बोलने वाले बच्चों / अध्यापको से ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों के सामने खुद को एकदम तुच्छ समझने लगा था, करता भी क्या रोज की भागदौड़ में ना कुछ सोचने का समय था ना कुछ करने का, बस इसीतरह चल रहा था सबकुछ कब तीन महीने निकल गए पता ही नही चला और त्रैमासिक परीक्षा शुरू हो गयी,
परीक्षा थी भाग तो सकते नही थे हमने भी दी, परिणाम हमारी मेहनत और उम्मीद से कहीं बुरा था, मतलब कुल 5 विषयो में से दो ( अँग्रेजी और भौतिकी) में हम फेल हो चुके थे... मतलब आधी हिम्मत जवाब दे चुकी थी, घर वालो को कैसे बताया ये अब याद नही, वैसे फेल होने वाला मैं अकेला नही था क्लास के ज्यादातर बच्चे फेल ही थे, लेकिन मेरे लिए ये किसी सदमे से कम नही था, मतलब शाम को जो थोड़ा बहुत समय मेरे लिए होता था अब उसमे भी पढाई होने लगी पढाई कुछ नही बस शहर के बच्चों की देखा देखी रंगीन नोट्स बनाने शुरू किये, जिन दो विषयो में फेल हुआ उनपर थोड़ा ज्यादा ध्यान देना शुरू किया, मतलब अब दोस्त और खेल बिलकुल छूट चके थे जिनसे पहले भी कोई खास वास्ता नही था मेरा,
अब तक साथ में जाने वालों एक दो लड़को से थोड़ी जान पहचान भी हो गयी थी जोकि रास्ते में पड़ने वाले एक गाँव से मेरे ही कॉलेज जाते थे,
अब आ गयी छमाही परीक्षा, पूरी हिम्मत से परीक्षा दी
परिणाम इस बार फिर हमारी उम्मीदों से परे था लेकिन अब तक उसे सहने की हिम्मत जुटा ली थी, इस बार भी हम दो विषयो ( गणित और रसायन) में लुढ़क चुके थे लेकिन संतुष्टि ये थी कि जिन दो विषयो में त्रैमासिक में हम डूबे थे उन विषयो में अपनी मेहनत से हम ठीक ठाक अंको से पास हो गए थे, लेकिन बार के परिणाम को स्वीकार करना घर वालो के लिए थोड़ा मुश्किल था, घर वालो में अब मुझे भी ट्यूशन भेजने का मन बना लिया था यो घर के पास ही एमएससी के एक छात्र के पास हम भी ट्यूशन पढ़ने जाने लगे, और ट्यूशन का समय था सुबह स्कूल जाने से पहले मतलब सुबह 4 बजे से 5 बजे तक, जिंदगी और मुश्किल होती जा रही थी रोज लेकिन मरता क्या ना करता, अपनी और घर वालो की इज्जत का सवाल था, कुछ भी करके पास होना था. मासिक परीक्षाओं का दौर जारी था और मेरी हालात बद से बदतर होती जा रही थी,
अब आते असली मुद्दे पर मतलब सालाना परीक्षा, पहली ही परीक्षा गणित की थी, पेपर से पहले 3 दिन की छुट्टी भी थी, आखिर कर परीक्षा की घड़ी आ गयी और पेपर देखते ही हमारे दिमाग का बल्ब बुझ चूका था, आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा था , मुश्किल से 15 से 20 नम्बर का पेपर आता होगा, छमाही में पहले ही फेल हो चुके थे सालाना में भी पास होने की उम्मीदे टूट चुकी थी, आए थे इस उम्मीद से की छमाही सालाना दोनों मिलाकर पास हो जाएंगे लेकिन अब सब कुछ ख़त्म हो चूका, परीक्षा के दौरान ही एक नोटिस आता है कि अपना कक्षा 10 का प्रमाणपत्र लाना है और तुरंत ही हमारे दिमाग में चाचा चौधरी की तरह एक प्लान आया इस फेल होने के झमेले से बचने का....
घर परिवार सबसे दूर जाने का प्लान....
घर वालो सामना करने की हिम्मत अब नही बची थी, स्कूल से निकला सड़कों पर घूमता रहा... शाम हुई शाम तक आत्महत्या का फैसला कर लिया था, रेलवे लाइन रास्ते में ही पड़ती थी तो पहुँच गये, बस्ती से थोड़ा आगे निकला अँधेरा हो चुका था आँखे बंद करके लेट गया पटरी पर गर्दन रखकर, करीब एक घंटा इंतज़ार करने के बाद भी कोई ट्रैन नही आई अब तक ना शरीर में ताकत बची थी ना सोचने समझने की शक्ति, पैदल ही अब रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़ा रात हो चुकी थी, स्टेशन पर एक ट्रेन खड़ी थी बिना टिकट लिए जाकर बैठ गया बिना देखे की ट्रेन कहाँ जा रही है, रात के करीब 12 बजे ट्रेन दिल्ली पहुंची, दिल्ली अंतिम स्टेशन था कुछ समझ नही आया तो सामने खड़ी दूसरी ट्रेन में चढ़ गया रात का समय था ऊपर वाली सीट पर चुपचाप लेट गया, दिन भर की शारीरिक और मानसिक थकान की वजह से कब नींद आ गयी पता नही चला, सुबह जब नींद खुली तो ट्रेन भिवानी हरियाणा में थी, वो भी अंतिम स्टेशन था, ट्रेन से उतर कर प्लेटफॉर्म पर बैठ गया, अब भूख ने फिर दस्तक देनी शुरू की, जेब में देखा तो कुल 43 रूपये थे, 10 रूपये के समौसे खाकर पेट की आग को शांत किया, लेकिन दिमाग की आग अभी भी जल रही थी,
आगे क्या करना है कुछ समझ नही आ रहा था, परेशान हालत में प्लेटफॉर्म पर बैठा था, तभी बगल वाले सीट पर एक आदमी आकर बैठ गया, जिसने मुझसे बात करनी शुरू की, मैंने उसे बोल दिया की यहाँ किसी काम से आया हूँ अगली ट्रैन से वापस जा रहा हूँ लेकिन शायद वो मुझे देख कर अंदाज लगा चुका था इसलिए बात करता गया, शाम तक वहां कोई ट्रैन नही थी इसीलिये उसने बोला की मेरा घर पास ही है उसके घर उसके साथ चलने को, और मैं उसकी बातों में आ गया था मैं उसके साथ हो लिया, स्टेशन से थोड़ा ही आगे जाकर एक कच्ची सी कॉलोनी में उसका घर था जिसपर ताला लटका हुआ था, उसने बताया उसका परिवार गाँव में रहता है
No comments:
Post a Comment