चीनू और टीटू के शिकंजे में आखिर चिड़िया आ ही गई।
कई दिनों से चीनू और टीटूू चिड़िया पकड़ने की फिराक में थे। बरामदे की छत्त में चिड़ियों ने घोंसले बना रखे थे। समय आने पर उनके छोटे छोटे बच्चे घोंसले से बाहर निकल आए। बहुत छोटे बच्चे ‘‘ची ची’’ करते अपने मां बाप के साथ उड़ने लगे। दोनों इनको पकड़ने के लिए भागते, ये ऊंची जगह पर बैठ जाते। वे उन्हें पकड़ने की कई तरकीबें बनाते परन्तु कामयाब नहीं होते।
आखिर एक दिन जब टीटू घर में घुसा तो एक चिड़िया को शीशे के पास बैठे देखा। चिड़िया बार बार अपनी चोंच से शीशे में टक टक कर रही थी। चिड़िया इस काम में बहुत मगन थी। शायद उसे शीशे में एक और चिड़िया दिख रही थी। टीटू ने चुपचाप चीनू को भी बुला लिया। दोनों ने एक पतली चादर चिड़िया के ऊपर डाल दी। चिड़िया बहुत चीखी, चिल्लाई पर टीटू ने नहीं छोड़ा।
चिड़िया का मुंह खुला था। वह भय से कांप रही थी। अब सबसे पहला काम जो टीटू ने किया वह यह था कि पानी में रंग मिला कर चिड़िया को रंग डाला। पानी गिरने से चिड़िया चीं चीं कर चिल्लाती रही। चीनू कटोरी में दूध ले आयी और उसकी चोंच दूध में डूबो दी। परन्तु चिड़िया ने दूध नहीं पिया।
‘‘पापा! चिड़िया के लिए पिंजरा ला दो न।’’ चीनू ने कहा। उसके पापा चिड़िया को पकड़ने पर बहुत नाराज हुए। आखिर उसकी जिदद से तंग आ कर पिंजरा ला दिया। दोनां ने पिंजरे में सूखा घास डाल कर घोंसला बना दिया और चिड़िया को उसमें डाल दिया। चिड़ियां पिंजरे के भीतर उड़ने लगी और लोहे की जाली को चोंचे मारने लगी। थोड़ी ही देर में उसकी चोंच लहुलुहान हो गई। वह फर्र से उड़ती और धप्प से नीचे गिर जाती।
रात का पिंजरे में दूध की कटोरी, रोटी के टुकडे़ और चावल डाल कर दोनों निश्चिंत सो गए।
सुबह उठते ही पिंजरे के पास गए तो देखा चिड़िया एक ओर पड़़ी हुई थी....निढाल, बेसुध, गुमसुम। .....कहीं मर तो नहीं गई.... चीनू ने पिंजरा हिलाया। चिड़िया ने पड़े पड़े ही डर के मारे मुंह खोल दिया।
चिड़िया की हालत देख दोनां डर गए। चीनू ने चुपचाप चिड़िया को निकाला और बरामदे मे छोड़ दिया।
दोनों दिन भर डरे डरे रहे कि पता नहीं कब और कहां चिड़िया मरी हुई मिलेगी और पापा गुस्सा करेंगे।
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